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उनका कहना था-
कहाँ रहते हो
अब?
हाँ ये मामूली
सवाल है,
बहुतों ने बहुतों
से किया होगा...
पर उन गर्म
हवाओं ने,
उस मिटटी ने..
उस खुशबु ने, जब
ये सवाल किया
तो जैसे दिल
भर गया..
और दो बूंदे
आंसू की
गालों पे लुढ़क
आयी.
डबुआ-ज़वाहर कॉलोनी की
गलियों ने रुला
दिया.
हर एक कदम
उठाने में
दम लग रहा
था..
मिटटी पैरो से
चिपक सी जाती
थी.
कहाँ रहे इतने
दिन...??
क्या तुम्हे हमारी याद
नहीं आती थी.
आधे अधूरे कपड़ों में
तू मुझसे लिपट के
खेलता था
अब बड़ा हो
गया है तो-
मुझसे मिलने भी नहीं
आता.
अचानक हवा तेज
हो गयी...
मेरा एक आंसू
मिटटी में गिर
गया था
नन्हे दोस्त, वो मंदिर,
फूलचंद की दुकान
मैं घिर गया
था...
तब मैंने आँखें उठा
के उस आस्मां
को देखा
जिसे कोई बाँट
न सका..
हवा को धारण
करने वाले
उस शून्य ने मेरे
मोह के बंधन
काटे
और कहा तुम
चाहो तो
अभी ये समझ
सकते हो..
तुम किसी से
दूर नहीं...
सबमें समां सकते
हो..
सब तुममे समां सकता
है..
चैन आ गया.



