गुरुवार, 26 अगस्त 2010

बच्चा ही रहा


मासूम आँखें,काला चेहरा
छोटा भोला भाला चेहरा
मैले कुचैले और फटे
कपड़ों से अपना तन ढके
चिलचिलाती धुप में
नंगे पांव खड़ा है
देखने में छोटा है
पर गर्मी से भी बड़ा है

मैं तो सीधा देखता हूँ
नज़र उसपे जा पड़ी
उसी वक़्त, कमबख्त की भी
नज़र मुझपे आ पड़ी
गर कोई हसीन हो
मुश्किल है नज़र मिलाऊँ
इस मरियल काया वाले से
पर आँखें क्यों मैं चुराऊँ

जहां मैं अब खड़ा हूँ
वहाँ और खड़े हैं
सब के सब, हैसियत में
मुझसे कहीं बड़े हैं
इन आँखों की मोहिनी
पर नज़र किसे आती है
मैं ही थोडा मूरख हूँ
मुझे बड़ी भाती है

छोटा तो बस ताड़ गया
मेरे पास ही आ रुका
छोटा मुह खोल लिया
गर्दन थोड़ी ली झुका
बोला- भूख लगी है
मैं भी बोला मुझे भी
चल दोनों साथ खाएं
सस्ता ढाबा ढूंढ कोई

मैं उसे बुलाता हूँ
और आगे आगे चलता हूँ
वो बहुत धीरे चलता है
मैं थोडा अचरज करता हूँ
बात क्या है प्रभाकर
रफ़्तार तो तेज होनी थी
खाना मिलने वाला था
पर सूरत उसकी रोनी थी

तब चलते हुए मुझे रोका
आवाज किसी ने दी, टोका
इसे कहाँ ले जाते हो
क्यों बहकावे में आते हो
ये खाता नहीं, पीता है
सिलोचन पे ही जीता है
मैंने मुड़ के उसको देखा
दस कदम वो पीछे हटा

तब दूर किसी छोर से
किसी ने आवाज दी
छोटे ने नन्हे पांव से
एक दौड़ सरपट लगा दी
मैं रह गया ठगा खड़ा
रफ़्तार वो बेजोड़ थी
आँखें मली क्या यही काया
लग रही कमजोर थी

ये जान, सात- आठ की
ये देह सूखे काठ की
उसपे ये जहर पीता है
विस्मय है कैसे जीता है
देखता हूँ गौर से
और छः बच्चे वहाँ
बड़े इत्मीनान से
कर रहे हैं जो नशा

सब लोग मुझपे हंस रहे
फब्तियां हैं कस रहे
खुद मैं ही मुझसे कह रहा
अब हाथ क्यों है मल रहा
मूंछ दाढ़ी उग गयी
दुनिया से क्या सबक लिया
बच्चा ही रहा आज भी
बच्चे ने तुझको ठग लिया