शनिवार, 14 जून 2014

जाओ मन... मुझे और न उलझाओ

जाओ मन... मुझे और न उलझाओ
मुझे याद है, इस जनम में..
कोई मेरे मन का मीत नहीं
न कहो गुनगुनाने को
मेरे पास कोई गीत नहीं
मुझे झूठे किस्से, कहानियाँ न सुनाओ
जाओ मन... मुझे और न उलझाओ

कल्पना के परों पे... तुम ही नाज़ करो...
मुझे शांत रहने दो... न आवाज़ करो...
नहीं दे सकता और साथ तेरा, बेहतर है...
तुम भी जमीन पे आ जाओ... मुझे माफ़ करो....

जरा महसूस करने दो...सच की हवा...
मुझे गम और ख़ुशी की चादर न ओढ़ाओ...
जाओ मन... मुझे और न उलझाओ
और न उलझाओ

शुक्रवार, 24 मई 2013

ज़वाहर कॉलोनी की गलियों ने रुला दिया.

weaping Child
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उनका कहना था- कहाँ रहते हो अब?
हाँ ये मामूली सवाल है,
बहुतों ने बहुतों से किया होगा...
पर उन गर्म हवाओं ने,
उस मिटटी ने..
उस खुशबु ने, जब ये सवाल किया
तो जैसे दिल भर गया..
और दो बूंदे आंसू की
गालों पे लुढ़क आयी.
डबुआ-ज़वाहर कॉलोनी की
गलियों ने रुला दिया.

हर एक कदम उठाने में
दम लग रहा था..
मिटटी पैरो से चिपक सी जाती थी.
कहाँ रहे इतने दिन...??
क्या तुम्हे हमारी याद नहीं आती थी.

आधे अधूरे कपड़ों में
तू मुझसे लिपट के खेलता था
अब बड़ा हो गया है तो-
मुझसे मिलने भी नहीं आता.

अचानक हवा तेज हो गयी...
मेरा एक आंसू मिटटी में गिर गया था
नन्हे दोस्त, वो मंदिर, फूलचंद की दुकान
मैं घिर गया था...

तब मैंने आँखें उठा के उस आस्मां को देखा
जिसे कोई बाँट सका..
हवा को धारण करने वाले
उस शून्य ने मेरे मोह के बंधन काटे
और कहा तुम चाहो तो
अभी ये समझ सकते हो..
तुम किसी से दूर नहीं...
सबमें समां सकते हो..
सब तुममे समां सकता है..
चैन गया.

शनिवार, 11 अगस्त 2012

चाहत...एक उमंग !

ऐसा अक्सर होता है...की हम कुछ चाहते हैं और वो हमें नहीं मिलता....कुछ लोग कम कोशिश करके भी उसे हासिल कर लेते हैं! और किसी किसी को वो चीज़ बिना चाहे भी मिल जाती है!

ये सब देख के, मायूसी बढती जाती है. आप कहेंगे...कैसे कैसों को दिया है, ऐसे वैसों को दिया है. मगर जो इसके लायक हैं उन्हें ही मिलता है, ये सच है. उन्हें उसके बिना भी जीना आता है. कुदरत चाहती है की आप उसकी दी हुई हर चीज़ से प्यार करें...इससे एक संतुलन बनता है.

जो आपके पास पहले से है, जब वो आपको खुश नहीं कर पा रहा तो इसकी क्या गारंटी है कि जिसे आप चाहते हैं उसे पाके आप खुश रहेंगे, आखिर उसके बाद भी तो आप कुछ और चाहेंगे. चाहतें ख़त्म नहीं होती.

मैं ये नहीं कहता कि चाहत नहीं होनी चाहिए. इसका आपकी मौजूदा जिंदगी पे बुरा असर नहीं होना चाहिए. चाहत एक नयी सोच देती है, नया काम देती है, एक नयी उमंग देती है. और बिना उमंग की जिंदगी बेकार है....इसलिए चाहत होनी चाहिए.

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

बच्चा ही रहा


मासूम आँखें,काला चेहरा
छोटा भोला भाला चेहरा
मैले कुचैले और फटे
कपड़ों से अपना तन ढके
चिलचिलाती धुप में
नंगे पांव खड़ा है
देखने में छोटा है
पर गर्मी से भी बड़ा है

मैं तो सीधा देखता हूँ
नज़र उसपे जा पड़ी
उसी वक़्त, कमबख्त की भी
नज़र मुझपे आ पड़ी
गर कोई हसीन हो
मुश्किल है नज़र मिलाऊँ
इस मरियल काया वाले से
पर आँखें क्यों मैं चुराऊँ

जहां मैं अब खड़ा हूँ
वहाँ और खड़े हैं
सब के सब, हैसियत में
मुझसे कहीं बड़े हैं
इन आँखों की मोहिनी
पर नज़र किसे आती है
मैं ही थोडा मूरख हूँ
मुझे बड़ी भाती है

छोटा तो बस ताड़ गया
मेरे पास ही आ रुका
छोटा मुह खोल लिया
गर्दन थोड़ी ली झुका
बोला- भूख लगी है
मैं भी बोला मुझे भी
चल दोनों साथ खाएं
सस्ता ढाबा ढूंढ कोई

मैं उसे बुलाता हूँ
और आगे आगे चलता हूँ
वो बहुत धीरे चलता है
मैं थोडा अचरज करता हूँ
बात क्या है प्रभाकर
रफ़्तार तो तेज होनी थी
खाना मिलने वाला था
पर सूरत उसकी रोनी थी

तब चलते हुए मुझे रोका
आवाज किसी ने दी, टोका
इसे कहाँ ले जाते हो
क्यों बहकावे में आते हो
ये खाता नहीं, पीता है
सिलोचन पे ही जीता है
मैंने मुड़ के उसको देखा
दस कदम वो पीछे हटा

तब दूर किसी छोर से
किसी ने आवाज दी
छोटे ने नन्हे पांव से
एक दौड़ सरपट लगा दी
मैं रह गया ठगा खड़ा
रफ़्तार वो बेजोड़ थी
आँखें मली क्या यही काया
लग रही कमजोर थी

ये जान, सात- आठ की
ये देह सूखे काठ की
उसपे ये जहर पीता है
विस्मय है कैसे जीता है
देखता हूँ गौर से
और छः बच्चे वहाँ
बड़े इत्मीनान से
कर रहे हैं जो नशा

सब लोग मुझपे हंस रहे
फब्तियां हैं कस रहे
खुद मैं ही मुझसे कह रहा
अब हाथ क्यों है मल रहा
मूंछ दाढ़ी उग गयी
दुनिया से क्या सबक लिया
बच्चा ही रहा आज भी
बच्चे ने तुझको ठग लिया

बुधवार, 9 जून 2010

दो पल जिंदगी



मै पल दो पल का शायर हूँ
पल दो पल मेरी कहानी है
पल दो पल मेरी हस्ती है
पल दो पल मेरी जवानी है

इस दो पल में कुछ जल्दी से 
मैंने हासिल करना चाहा 
कुछ थका हुआ था लहरों से 
सुस्ताने को साहिल चाहातुमने मुझको झकझोर दिया 
एक नई सीख सिखला दी है
 मत रुक बन्दे बस चलता जा 
आधे एक पल की आंधी हैइस पल के बाद एक पल है 
उस पल को चैन से जीऊंगा 
आराम से रोटी खाऊंगा 
और मीठा पानी पीऊंगापर इस पल मैं टकराऊंगा
 लहरों को सलामी भी दूंगा 
और इस पल में गर प्यास लगे 
खारा पानी ही पी लूँगा

मैं पल दो पल का शायर हूँ
 पल दो पल मेरी कहानी है 
पल दो पल मेरी हस्ती है 
पल दो पल मेरी जवानी है

शनिवार, 1 मई 2010

मेरी क्या खता है ?


उठते है कदम, बढ़ते हैं कदम,एक रास्ता है जिंदगी
इस रास्ते में कुछ पड़ाव,नाम है.. गम और ख़ुशी
मैं चल रहा हूँ रास्ते में,काफिले मिल जाते हैं
मेरी तरह कुछ और
मुसाफिर वहाँ मिल जाते हैं
कोई हंस दिया कोई रो दिया,कुछ ने सुना दी दास्तान
मैंने कहा उसने सुना,उसने कहा मैंने सुना
कुछ देर का आराम मुझको,आज भारी पड़ गया
ठंडक सुबह की रही,अब सूर्य ऊपर चढ़ गया
इस धूप में वो क्यूँ चले,वो सो रही है छांह में
और छोड़ के उसको अकेला,चल दिया मैं राह में
अब उसे जो याद आऊं
मैं, तो मेरी क्या खता है
कह दो उसको भूले मुझको,जिंदगी एक रास्ता है
मैं हूँ सही या हूँ गलत,ये खुदा मेरा जानता है
ये जान लो, ये मुसाफिर
अच्छा-बुरा पहचानता है

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

एक कोशिश

हंस के देख दे तू एक बार मेरी तरफ,
तेरी तस्वीर मेरे दिल में रहेगी हरदम
दो लफ्ज़ प्यार के नहीं तो ताने ही सही
तेरी चुप्पी मगर नहीं सुन सकता इस दम


मैंने माना के मेरे पास है रंगों की कमी
और रंगों में तेरी जिंदगी रहती है रमी
रंग अच्छे हैं मगर मुझे तो चिढाते हैं
मेरा वादा है मैं सफ़ेद रहूँगा हरदम

मेरा मिलना तुझे मिलना न लगे मुमकिन है
मेरी बातों में तुझे कुछ न मिले मुमकिन है
ये भी है मुमकिन मैं तुझे हंसा न सकूं
तेरी हंसी लेकिन कैद रखूँगा हरदम

हंस के देख दे तू एक बार मेरी तरफ,
तेरी तस्वीर मेरे दिल में रहेगी हरदम