शनिवार, 1 मई 2010

मेरी क्या खता है ?


उठते है कदम, बढ़ते हैं कदम,एक रास्ता है जिंदगी
इस रास्ते में कुछ पड़ाव,नाम है.. गम और ख़ुशी
मैं चल रहा हूँ रास्ते में,काफिले मिल जाते हैं
मेरी तरह कुछ और
मुसाफिर वहाँ मिल जाते हैं
कोई हंस दिया कोई रो दिया,कुछ ने सुना दी दास्तान
मैंने कहा उसने सुना,उसने कहा मैंने सुना
कुछ देर का आराम मुझको,आज भारी पड़ गया
ठंडक सुबह की रही,अब सूर्य ऊपर चढ़ गया
इस धूप में वो क्यूँ चले,वो सो रही है छांह में
और छोड़ के उसको अकेला,चल दिया मैं राह में
अब उसे जो याद आऊं
मैं, तो मेरी क्या खता है
कह दो उसको भूले मुझको,जिंदगी एक रास्ता है
मैं हूँ सही या हूँ गलत,ये खुदा मेरा जानता है
ये जान लो, ये मुसाफिर
अच्छा-बुरा पहचानता है

6 टिप्‍पणियां:

  1. आईये जानें … सफ़लता का मूल मंत्र।

    आचार्य जी

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  2. "मैं हूँ सही या हूँ गलत,
    ये खुदा मेरा जानता है।
    ये जान लो, ये मुसाफिर
    अच्छा-बुरा पहचानता है"
    सच्ची और अच्छी रचना लगी - यदि हम इतना सोच सकें कि क्या अच्छा है और क्या बुरा तो मेरे विचार में गलत करने की संभावना कम ही रहती है

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  3. जज्बातों को खूबसूरती से लिखा है...सुन्दर अभ्व्यक्ति


    कृपया कमेंट्स से वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें...टिप्पणी देने में सरलता होगी..

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  4. अब उसे जो याद आऊं
    मैं, तो मेरी क्या खता है।
    कह दो उसको भूले मुझको,
    जिंदगी एक रास्ता है।
    मैं हूँ सही या हूँ गलत,
    ये खुदा मेरा जानता है ..
    बहुत खूब ... बढ़िया लिखा है ... अच्छी रवानगी है इस रचना में ...

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