शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

व्यथा

गंभीरता की बातों को मजाक में लेना अपनी ही हँसी उड़ने जैसा है।............वैसे तो, परिस्थिति भी जिम्मेदार है कीआप बात कह किसके सामने रहे हैं, उसकी प्रकृति क्या है, क्या वह विनोदी स्वाभाव वाला है? अगर हाँ तो ये आपकादोष है। ऐसे लोगों के सामने आप अपनी समस्या या गंभीर प्रश्नों को लेके ना बैठे । क्योँ की विनोदी जीव इश्वर कीइच्छानुसार कभी भी गंभीर न होने के लिए ही अस्तित्वा में आया है।

अब रही बात आपके प्रश्नों की तो विश्वास रखें आप ही उनका सटीक उत्तर दे सकतें हैं।

ये तो एक प्रकृति हैं, इससे कोई खतरा नही, और न ही ऐसे लोगों से नाराज होने की जरुरत हैं। जरा दुसरे किस्म केलोगों से सावधानी रक्खें। ये एक बार आपकी कोई भी समस्या सुन सकतें हैं और आपको सलाह भी दे सकतें हैंलेकिन आपको कमजोर भी समझ सकतें हैं। अगर आप किसी ऐसे प्रकृति के जीव को अपना मानतें हैं और चाहतेंहैं की वह भी आपका सम्मान करें तो कृपया उसे अपना कोई दुःख न सुनाएं। याद रखें मन की पीड़ा कह देने से कभीकम नहीं होती।

अगर किसी से कहना ही हैं तो ऐसे आदमीं से कहिये जिस पर आपको ख़ुद से ज्यादा विश्वास हैं। आप या तो पाएंगेकी आपकी समस्या हल हो गयी, नही तो आपका दर्द जरूर कम हो जाएगा। क्यों की आप ख़ुद को अकेला नहींपायेंगे।